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वाटरशेड प्रबंधन

बनाया गया : 19/09/2014
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वाटरशेड (जल विभाजक) एक भौगोलिक यूनिट है जिसमें एक सामान्य प्राकृतिक जल निकासी आउटलेट होता है। इसकी सीमा 500 (माइक्रो -वाटरशेड) से लेकर 5000 हेक्टेयर (सब-वाटरशेड) तक अलग-अलग होती है। प्रबंधन के उद्देश्य से 5000 हेक्टेयर को एक मध्यवर्ती यूनिट माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में वाटरशेड के विकास की अवधारणा का विस्तार साधारण मिट्टी और जल संरक्षण से लेकर प्राकृतिक संसाधनों के सम्पूर्ण विकासात्मक दृष्टिकोण तक हुआ है। इस प्रकार, क्षेत्र के दृष्टिकोण से हटकर विकास के एक व्यवस्थित दृष्टिकोण की तरफ एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है।

भारत के फसली क्षेत्र का 68% हिस्सा वर्षा आधारित कृषि का है जो 480 मिलियन लोगों को आजीविका प्रदान करता है। देश में ज़मीन का बहुत बड़ा हिस्सा शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु क्षेत्र के अंतर्गत आता है, इसलिए कृषि क्षेत्र में उत्पादन की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए वाटरशेड प्रबंधन ही एकमात्र करने योग्य विकल्प है, खासकर बारिश से भरे देश के असिंचित इलाकों में।

ग्रामीण विकास मंत्रालय का भूमि संसाधन विभाग वर्ष 2009-10 से एकीकृत वाटरशेड विकास कार्यक्रम यानी इंटीग्रेटेड वाटरशेड डेवलपमेंट प्रोग्राम (IWMP) लागू कर रहा है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2027 तक 55 मिलियन हेक्टेयर वर्षा आधारित भूमि को कवर करना है। यह प्रोग्राम देश के सभी राज्यों में लागू किया जा रहा है। इस प्रोग्राम के लिए केंद्र और राज्य सरकार 90:10 के अनुपात में फाइनेंस करती है। IWMP चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा वाटरशेड प्रोग्राम है। इस प्रोग्राम में वाटरशेड प्रबंधन पहलों के जरिए मिट्टी, वनस्पति कवर और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके, संरक्षण करके और विकास करके पारिस्थितिक संतुलन को फिर से स्थापित करने पर विचार किया गया है। IWMP के नतीजों में मिट्टी के बहाव को रोकना, प्राकृतिक वनस्पतियों का फिर से उत्पादन, वर्षा जल इकट्ठा करना और ग्राउंड वाटर टेबल को फिर से चार्ज करना शामिल है। यह प्रोग्राम मल्टी-क्रॉपिंग और कृषि आधारित कई तरह की गतिविधियों को शुरू करने में मदद करता है, जो वाटरशेड क्षेत्र में रहने वाले लोगों को लम्बे समय तक चलने वाली आजीविका प्रदान करने में मदद करती हैं।

यह समूह वाटरशेड प्रबंधन के विभिन्न मुद्दों पर नागरिकों से नवीन जानकारी मांगता है।