Srikant Dubey
7 years 3 months ago
आज हमारी संस्कृति बदल रही है लोग आज दुसरो की दी हुई किताबो को कम पसंद करते है लेकिन फिर भी समाज में अभी भी एक वर्ग है जो पुराणी किताबो से पढ़ने को मजबूर है। अतः उस आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए छोड़ी हुई किताबे किसी वरदान से कम नही है। वैसे भी किताबे हमारे चरित्र का निरमाण करती है और हमे भी एक दूसरे के सहयोग में उन शिक्षाप्रद किताबो को किसी जरूरत मंद को दे देने से एक सुकून मिल सकता है और सहयोग भी हो जाता है। धन्यवाद श्रीकांत दुबे कानपूर
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